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कुवर मंगेश प्रल्हाद
शोधार्थी
महाराजा अग्रसेन हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय
उत्तराखंड
डॉ. सुचिता उपाध्याय
मार्गदर्शक
महाराजा अग्रसेन हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय
उत्तराखंड
सार— प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य 1900 से 1960 के मध्य महाराष्ट्र में चले दलित आंदोलन और मुख्यधारा की मराठी पत्रकारिता के बीच संबंधों का तुलनात्मक अध्ययन करना है। यह कालखंड भारतीय समाज में सामाजिक, राजनीतिक एवं वैचारिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण दौर रहा है। डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन ने समानता, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के लिए संगठित संघर्ष किया। इस आंदोलन के प्रचार, प्रसार और वैचारिक सुदृढ़ीकरण में पत्रकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इस अध्ययन में दलित पत्रकारिता और मुख्यधारा की मराठी पत्रकारिता दोनों के दृष्टिकोण, विषय-वस्तु, भाषा-शैली और वैचारिक प्रतिबद्धता का विश्लेषण किया गया है। ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘समता‘, ‘जनता’ तथा ‘प्रबुध्द भारत‘ जैसी दलित पत्र-पत्रिकाओं ने दलित समाज की पीड़ा, शोषण और संघर्ष को मुखर स्वर प्रदान किया, वहीं मुख्यधारा की मराठी पत्रकारिता प्रायः राष्ट्रीय आंदोलन, राजनीतिक मुद्दों और सामाजिक सुधारों पर केंद्रित रही। हालांकि कुछ अवसरों पर मुख्यधारा की पत्रकारिता ने दलित प्रश्नों को स्थान दिया, किंतु उसका दृष्टिकोण सीमित और सतर्क रहा।यह शोध ऐतिहासिक एवं वर्णनात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया गया है। तुलनात्मक विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि दलित पत्रकारिता सामाजिक परिवर्तन का सक्रिय माध्यम बनी, जबकि मुख्यधारा की मराठी पत्रकारिता ने अपेक्षाकृत निष्क्रिय भूमिका निभाई। अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि दलित आंदोलन की वैचारिक शक्ति को समझने के लिए दलित पत्रकारिता का अध्ययन अनिवार्य है। यह शोध सामाजिक न्याय, समावेशी पत्रकारिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ को और सुदृढ़ करता है।
कुंजी शब्द— दलित आंदोलन, मराठी पत्रकारिता, मुख्यधारा की पत्रकारिता, डॉ. भीमराव आंबेडकर, सामाजिक न्याय, महाराष्ट्र, 1900-1960।
संदर्भ सूची
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